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अब छोटे जिलों में भी संभल रहे जटिल प्रसव, योगी सरकार की ट्रेनिंग से डॉक्टरों का बढ़ा भरोसा

हाई रिस्क गर्भावस्था के मामलों में रेफरल घटा, प्रशिक्षण के बाद स्थानीय अस्पतालों में ही सुरक्षित इलाज; सीतापुर में तीन महीने में 2,218 प्रसव संभाले गए
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Bureau News Desk
13 Jul 2026
06:02 PM
1 min read
अब छोटे जिलों में भी संभल रहे जटिल प्रसव, योगी सरकार की ट्रेनिंग से डॉक्टरों का बढ़ा भरोसा
हाइलाइट्स
आरआरटीसी प्रशिक्षण के बाद जिला अस्पतालों के डॉक्टर अब हाई रिस्क प्रसव के मामलों का स्थानीय स्तर पर इलाज कर रहे हैं।
पहले चरण में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों को प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया था।
सीतापुर जिला महिला अस्पताल में तीन महीने के भीतर 2,218 सुरक्षित प्रसव कराए गए, जिनमें कई हाई रिस्क मामले भी शामिल रहे।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार प्रशिक्षण के बाद डॉक्टरों का आत्मविश्वास बढ़ा है और गंभीर मामलों में रेफरल की आवश्यकता कम हुई है।

उत्तर प्रदेश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को जिला स्तर पर मजबूत करने की दिशा में शुरू की गई प्रशिक्षण व्यवस्था का असर अब अस्पतालों में दिखाई देने लगा है। जिन हाई रिस्क गर्भावस्था के मामलों को पहले बड़े मेडिकल कॉलेजों या उच्च संस्थानों में रेफर किया जाता था, अब उन्हें कई जिलों के सरकारी अस्पतालों में ही सुरक्षित तरीके से संभाला जा रहा है। राज्य सरकार के अनुसार, डॉक्टरों को दिए जा रहे व्यवहारिक प्रशिक्षण के बाद जटिल प्रसव मामलों के प्रबंधन में उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और रेफरल की आवश्यकता कम हुई है।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर संचालित रीजनल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग सेंटर (आरआरटीसी) कार्यक्रम के तहत जिला स्तर पर कार्यरत स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों को चरणबद्ध तरीके से प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रशिक्षण का उद्देश्य गंभीर प्रसव संबंधी जटिलताओं का स्थानीय स्तर पर सुरक्षित उपचार सुनिश्चित करना और मातृ मृत्यु दर में कमी लाना है।

चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव डॉ. पिंकी जोवल के अनुसार, जिलों में विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध होने के बावजूद कई बार गंभीर प्रसव संबंधी मामलों को उच्च संस्थानों में रेफर करना पड़ता था। इसका मुख्य कारण जटिल परिस्थितियों में उपचार संबंधी व्यावहारिक अनुभव और आत्मविश्वास की कमी थी।

इसी आवश्यकता को देखते हुए वर्ष 2017 में आरआरटीसी कार्यक्रम की शुरुआत की गई। पहले चरण में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों को प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया, जहां से आसपास के जिलों के डॉक्टरों को व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया गया। वर्तमान में कार्यक्रम के दूसरे चरण में हाइब्रिड मॉडल के माध्यम से प्रशिक्षण का विस्तार किया जा रहा है।

प्रशिक्षण के दौरान चिकित्सकों को गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप, प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव, लंबे समय तक प्रसव पीड़ा, बाधित प्रसव, शॉक तथा अन्य जटिल परिस्थितियों के प्रबंधन की व्यवहारिक जानकारी दी जाती है।

विशेषज्ञों की निगरानी में चिकित्सकों को वास्तविक मामलों पर प्रशिक्षण देकर उपचार संबंधी निर्णय लेने की क्षमता विकसित की जा रही है, जिससे जिला अस्पतालों में ही अधिक से अधिक मरीजों का सुरक्षित उपचार संभव हो सके।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सीतापुर जिला महिला अस्पताल में प्रशिक्षण प्राप्त पांच चिकित्सकों ने पिछले तीन महीनों के दौरान कुल 2,218 सुरक्षित प्रसव कराए। इनमें गंभीर एनीमिया, अत्यधिक उच्च रक्तचाप और अन्य जटिल प्रसव स्थितियों वाले कई हाई रिस्क मामले शामिल रहे।

अस्पताल की महिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. कमलेश कुमारी के अनुसार, प्रशिक्षण पूरी तरह व्यवहारिक है। इसमें पहले तकनीकी जानकारी दी जाती है और फिर विशेषज्ञों की मौजूदगी में जटिल मामलों के उपचार का अभ्यास कराया जाता है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के बाद अब अधिकांश हाई रिस्क मामलों का उपचार स्थानीय स्तर पर ही किया जा रहा है और केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही मरीजों को रेफर किया जाता है।

डॉ. कमलेश कुमारी ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद चिकित्सकों में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता विकसित हुई है। पहले जहां अस्पताल में प्रतिदिन दो से तीन सिजेरियन प्रसव होते थे, वहीं अब औसतन 10 से 12 सिजेरियन प्रसव प्रतिदिन किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि लखीमपुर, शाहजहांपुर, बरेली, बहराइच, हरदोई और गोंडा सहित आसपास के कई जिलों से भी महिलाएं प्रसव के लिए सीतापुर जिला महिला अस्पताल पहुंच रही हैं।

वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल, लखनऊ के चिकित्सा अधिकारी डॉ. देशबंधु गुप्ता ने बताया कि अस्पताल के 10 चिकित्सकों ने यह प्रशिक्षण प्राप्त किया है। उनके अनुसार, प्रशिक्षण का प्रभाव अस्पताल में मातृ मृत्यु दर के आंकड़ों में भी दिखाई दिया है और इसमें 80 से 90 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।

उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के बाद जटिल मामलों में निर्णय लेने की गति और चिकित्सकों का आत्मविश्वास दोनों बढ़े हैं, जिससे उपचार शुरू करने में देरी नहीं होती।

मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका डॉ. सुनीता कश्यप ने भी माना कि प्रशिक्षण के बाद डॉक्टरों का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे जच्चा-बच्चा दोनों की सुरक्षित देखभाल करने में पहले की तुलना में अधिक सक्षम हुए हैं।

आरआरटीसी की नोडल अधिकारी डॉ. सीमा टंडन ने बताया कि कार्यक्रम के तहत अब तक किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले सीतापुर, बहराइच, बलरामपुर, गोंडा और श्रावस्ती तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से संबद्ध हाथरस, कासगंज और अलीगढ़ के जिला अस्पतालों के चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि अगले चरण में अन्य मंडलों के डॉक्टरों को भी इसी मॉडल पर प्रशिक्षण देने की तैयारी की जा रही है।

आरआरटीसी की मेंटर और क्वीन मैरी अस्पताल की विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल ने कहा कि व्यवहारिक प्रशिक्षण से चिकित्सकों का आत्मविश्वास बढ़ा है और अब वे अपने जिलों में ही कई जटिल प्रसव संबंधी मामलों का उपचार कर रहे हैं। उनके अनुसार, पहले ऐसे कई मरीज उच्च संस्थानों में रेफर होकर आते थे, जबकि उचित प्रशिक्षण मिलने पर उनका उपचार जिला स्तर पर भी संभव है।

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