>उत्तर प्रदेश की राजनीति में “पीडीए” (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का जिक्र इन दिनों सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे अपनी राजनीति की धुरी बना लिया है। लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले ने सपा को मजबूत किया और अब 2027 विधानसभा चुनाव में भी यही रणनीति सपा के लिए जीत की कुंजी हो सकती है। लेकिन बीजेपी इस सियासी जाल को काटने के लिए नई चाल चलती दिख रही है।
>कौशांबी जिले की चायल सीट से विधायक पूजा पाल इस समय यूपी की राजनीति का केंद्र बन गई हैं। सपा से निष्कासित होने के बाद पूजा पाल ने लगातार पत्र लिखकर और सोशल मीडिया पर बयान देकर पीडीए का मुद्दा उठाया। यही कारण है कि अब उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई हैं।
>पीडीए राजनीति और अखिलेश यादव की रणनीति
>सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में कहा कि मौजूदा सरकार में सबसे ज्यादा पीड़ा पीडीए समाज झेल रहा है। लोकसभा चुनावों के दौरान ओबीसी, दलित और मुस्लिम समुदाय से मिले समर्थन ने सपा को मजबूत बनाया। आंकड़े बताते हैं कि सपा का वोट शेयर 2019 में 18.11% था, जो 2024 में बढ़कर 33.59% हो गया। यही कारण है कि अखिलेश को भरोसा है कि पीडीए उन्हें सत्ता तक पहुंचा सकता है।
>बीजेपी की रणनीति और पूजा पाल की एंट्री की अटकलें
>पूजा पाल का बीजेपी के नजदीक आना सीधे तौर पर सपा की “पीडीए राजनीति” को चुनौती माना जा रहा है। बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि अखिलेश यादव ने पीडीए से आने वाली एक बेटी के साथ अन्याय किया। वहीं, यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और कैबिनेट मंत्री दयाशंकर सिंह ने भी खुलकर पूजा पाल का समर्थन किया।
>अगर बीजेपी में आईं पूजा पाल तो क्या होगा असर?
>अगर पूजा पाल बीजेपी का दामन थाम लेती हैं तो इसका सियासी संदेश दूरगामी हो सकता है।
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बीजेपी दिखा पाएगी कि सपा महिलाओं और पिछड़े वर्ग का सम्मान नहीं करती।
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पाल जाति के वोटर्स को साधने की कोशिश होगी।
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“पीडीए = वोट बैंक” वाली सपा की राजनीति पर बीजेपी सवाल खड़ा करेगी।
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>यानी पूजा पाल की एंट्री से बीजेपी सपा के गढ़ में सेंधमारी कर सकती है और पीडीए समीकरण को अपने पक्ष में मोड़ सकती है।
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