राजधानी के चिनहट थाने से जुड़ा एक मामला इन दिनों पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक विवेचना, कुछ गंभीर आरोप, कथित रिश्वत की मांग और आखिरकार अदालत का आदेश इन घटनाओं की कड़ी अब न्यायिक जांच के दायरे में पहुंच गई है।
मामला अपट्रॉन चौकी के तत्कालीन प्रभारी धनंजय सिंह और उपनिरीक्षक मनोज कुमार से जुड़ा है। हालांकि इस पूरे प्रकरण में अभी किसी भी आरोपी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया है, लेकिन विशेष न्यायालय ने शिकायत में लगाए गए आरोपों को सुनवाई योग्य मानते हुए परिवाद दर्ज करने का आदेश दिया है। अब आगे की कानूनी प्रक्रिया अदालत की निगरानी में चलेगी।
इस मामले की शुरुआत एक जानलेवा हमले के मुकदमे की विवेचना से हुई। शिकायतकर्ता अधिवक्ता आशाराम का आरोप है कि जांच के दौरान वास्तविक आरोपियों को बचाने और कुछ अन्य लोगों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। उनका कहना है कि उन्होंने कथित अनियमितताओं का विरोध किया, जिसके बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया।
शिकायतकर्ता ने अदालत में दायर परिवाद में आरोप लगाया है कि उनसे कथित तौर पर एक लाख रुपये रिश्वत की मांग की गई। आरोप यह भी है कि रकम नहीं देने पर उन्हें धमकाया गया, गाली-गलौज की गई और विवेचना को प्रभावित करने की चेतावनी दी गई। शिकायत में यह भी कहा गया है कि उन्होंने कई स्तरों पर अधिकारियों को लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इन सभी आरोपों की सत्यता का परीक्षण अभी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होगा।
न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर और विचारणीय हैं। अदालत ने आवेदन को धारा 173(4) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत परिवाद के रूप में पंजीकृत करने का निर्देश दिया है तथा शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करने के लिए 1 जुलाई 2026 की तारीख तय की है। अदालत ने इस स्तर पर आरोपों की सत्यता या दोषसिद्धि पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है।
अब अदालत शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करेगी। इसके बाद उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। फिलहाल मामला न्यायालय में विचाराधीन है और आरोपों की पुष्टि या खंडन न्यायिक सुनवाई के बाद ही हो सकेगा।
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