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महंगे पेट्रोल पर फूटा गिग वर्कर्स का गुस्सा, जोमाटो-स्विग्गी डिलीवरी वर्कर्स गए हड़ताल पर

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में यूनियन का ऐलान, दोपहर 12 से शाम 5 बजे तक ऐप बंद रखेंगे वर्कर्स, 20 रुपये प्रति किलोमीटर भुगतान की मांग
Bureau
Bureau Senior Journalist
15 May 2026
08:03 PM
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महंगे पेट्रोल पर फूटा गिग वर्कर्स का गुस्सा, जोमाटो-स्विग्गी डिलीवरी वर्कर्स गए हड़ताल पर

इमेज सोर्स (एआई)

 

देश में लगातार बढ़ रही पेट्रोल और डीजल की कीमतों का असर अब ऐप आधारित डिलीवरी और कैब सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। जीआइपीएसडब्ल्यूयू ने ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के विरोध में शुक्रवार को हड़ताल का ऐलान किया है। यूनियन के अनुसार दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक गिग वर्कर्स ऐप बंद रखकर विरोध प्रदर्शन करेंगे, जिससे कई शहरों में डिलीवरी और कैब सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

 

यूनियन का कहना है कि बढ़ती ईंधन कीमतों का सबसे अधिक असर उन डिलीवरी पार्टनर्स और ड्राइवरों पर पड़ रहा है, जो रोजाना बाइक और स्कूटर के जरिए अपनी सेवाएं देते हैं। स्विग्गी, जोमाटो, ब्लिंकीट, जेप्टो, ओला, उबर और रैपिडो जैसी कंपनियों से जुड़े लाखों वर्कर्स अपनी आय के लिए पूरी तरह वाहन आधारित सेवाओं पर निर्भर हैं। ऐसे में पेट्रोल-डीजल महंगा होने से उनकी दैनिक बचत और कमाई लगातार प्रभावित हो रही है।

 

जीआइपीएसडब्ल्यूयू ने मांग की है कि सभी गिग वर्कर्स के लिए न्यूनतम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का सर्विस रेट तय किया जाए। यूनियन का आरोप है कि ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद कंपनियां प्रति किलोमीटर भुगतान या डिलीवरी चार्ज में कोई बड़ा संशोधन नहीं करतीं, जिससे पूरा आर्थिक बोझ वर्कर्स पर आ जाता है।

 

यूनियन की अध्यक्ष सीमा सिंह ने कहा कि भीषण गर्मी में लंबे समय तक काम करने वाले डिलीवरी वर्कर्स पहले से ही दबाव में हैं और अब ईंधन की बढ़ी कीमतों ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि यदि कंपनियां भुगतान बढ़ाने पर कोई सकारात्मक फैसला नहीं लेती हैं तो आने वाले समय में आंदोलन को और तेज किया जा सकता है।

 

यूनियन के नेशनल कोऑर्डिनेटर निर्मल गोराना ने बताया कि देश में लगभग 1 करोड़ 20 लाख गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स कार्यरत हैं। इनमें फूड डिलीवरी, ग्रॉसरी डिलीवरी, लॉजिस्टिक्स और कैब सेवाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर इन वर्कर्स की आय पर पड़ता है, क्योंकि वाहन का ईंधन, सर्विसिंग और अन्य खर्च उन्हें अपनी जेब से वहन करने पड़ते हैं।

 

यूनियन ने केंद्र और राज्य सरकारों से भी हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन का कहना है कि ऐप आधारित कंपनियों को भुगतान दरों में संशोधन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए, ताकि बढ़ती ईंधन कीमतों का पूरा बोझ गिग वर्कर्स पर न पड़े।

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