>हिंदी व्यंग्य साहित्य को अपनी विशिष्ट शैली से समृद्ध करने वाले प्रख्यात साहित्यकार गोपाल चतुर्वेदी अब हमारे बीच नहीं रहे। पत्नी निशा चतुर्वेदी के निधन के मात्र छह दिन बाद, 24 जुलाई की रात उन्होंने अंतिम सांस ली। निशा जी 18 जुलाई को इस दुनिया से विदा हो गई थीं। यह जोड़ी सिर्फ निजी जीवन ही नहीं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय योगदान के लिए जानी जाती थी।
>15 अगस्त 1942 को लखनऊ में जन्मे गोपाल चतुर्वेदी ने प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के सिंधिया स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक कर भारतीय रेल सेवा में अधिकारी के रूप में चयनित हुए। वर्ष 1965 से 1993 तक उन्होंने रेलवे सहित अन्य केंद्रीय मंत्रालयों में कई उच्च पदों पर कार्य किया।
>रेल सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद वे पूरी तरह साहित्य साधना में लीन हो गए। पिछले दो दशकों से वे स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। उनकी रचनाओं में गद्य और पद्य दोनों विधाओं में गहरी पकड़ दिखाई देती है।
>उनके प्रमुख कविता संग्रह – ‘कुछ तो हो’ और ‘धूप की तलाश’ – साहित्य प्रेमियों में खासे लोकप्रिय हुए। वहीं व्यंग्य विधा में उन्होंने अपनी अलग ही छाप छोड़ी। ‘धाँधलेश्वर’, ‘अफसर की मौत’, ‘दुम की वापसी’, ‘राम झरोखे बैठ के’, ‘फाइल पढ़ी’, ‘आदमी और गिद्ध’, ‘कुर्सीपुर का कबीर’, ‘फार्म हाउस के लोग’ और ‘सत्तापुर के नकटे’ जैसे व्यंग्य संग्रहों ने उन्हें जनमानस में एक विशेष स्थान दिलाया।
>उनकी लेखनी व्यंग्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक प्रखर सामाजिक टिप्पणी के रूप में प्रस्तुत करती थी। वे समय-समय पर राजनैतिक, नौकरशाही और सामाजिक विसंगतियों पर करारी कलम चलाते रहे।
>गोपाल चतुर्वेदी को यश भारती सम्मान (2015), हिंदी भवन का व्यंग्य श्री सम्मान (2001) और केन्द्रीय हिंदी संस्थान से सुब्रमण्यम भारती पुरस्कार से नवाजा गया था।
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