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कांवड़ यात्रा मार्ग पर योगी सरकार का बड़ा आदेश, सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी

News Desk
News Desk Senior Journalist
22 Jul 2025
04:14 AM
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कांवड़ यात्रा मार्ग पर योगी सरकार का बड़ा आदेश, सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी


>उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित सभी होटलों और ढाबों पर अब क्यूआर कोड और वैध दस्तावेज अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करना होगा। योगी सरकार के इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी प्रकार की रोक लगाने से इंकार कर दिया है, जिससे राज्य सरकार को कानूनी समर्थन मिल गया है।


>यह आदेश कांवड़ यात्रा के अंतिम दिन, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि होटल मालिकों को वैधानिक रूप से अपने लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और अन्य अनिवार्य दस्तावेज खुले तौर पर प्रदर्शित करने होंगे।


>दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद झा समेत अन्य शिक्षाविदों द्वारा दायर याचिका में यह कहा गया था कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी आदेश निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिका में दावा किया गया कि इस तरह क्यूआर कोड और नाम प्रदर्शित करना एक प्रकार की धार्मिक व जातिगत प्रोफाइलिंग है, जो असंवैधानिक है।


>हालाँकि कोर्ट ने फिलहाल इस मुद्दे पर कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की, बल्कि यह कहा कि कांवड़ यात्रा अब समाप्ति की ओर है, इसलिए इस समय केवल वैधानिक दस्तावेजों के प्रदर्शन को लेकर ही आदेश दिया जा सकता है।


>उत्तर प्रदेश सरकार का उद्देश्य है कि कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित सभी खाने-पीने के स्थलों पर साफ पारदर्शिता बनी रहे, जिससे न सिर्फ यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, बल्कि स्वच्छता, खाद्य गुणवत्ता और ट्रैकिंग भी प्रभावी हो सके। QR कोड से दुकान मालिक की पहचान, लाइसेंस स्थिति, और खाद्य सुरक्षा की जानकारी आसानी से मिल सकेगी।


>सरकार की तरफ से 25 जून को एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा गया था कि हर भोजनालय पर QR कोड और मालिक की पहचान प्रदर्शित करना अनिवार्य है। इससे अस्थायी दुकानों की जवाबदेही भी तय की जा सकेगी।


>गौरतलब है कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश सरकारों के उस आदेश पर रोक लगा दी थी जिसमें कांवड़ यात्रा मार्ग के ढाबों पर मालिकों और कर्मचारियों के नाम-पते लिखे जाने की बात कही गई थी। कोर्ट ने तब इसे निजता और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन माना था।

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