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सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से करोड़ो बच्चों का उज्जवल होगा भविष्य

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश, शिक्षा के अधिकार में शामिल होंगे सभी अनाथ बच्चे
News Desk
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07 Aug 2025
01:30 AM
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सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से करोड़ो बच्चों का उज्जवल होगा भविष्य
हाइलाइट्स
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश, शिक्षा के अधिकार में शामिल होंगे सभी अनाथ बच्चे


>भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश के करोड़ों अनाथ बच्चों के भविष्य को उजाले में लाने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अब सभी राज्यों को अनिवार्य रूप से अनाथ बच्चों को “शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई)” के अंतर्गत लाना होगा। यह आदेश लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता पौलोमी पाविनी शुक्ला की जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई के बाद दिया गया।


>न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि राज्य को ‘अनाथ बच्चों का पालक पिता’ (Parens Patriae) माना जाएगा और उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह इन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा उपलब्ध कराए।


>सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सभी राज्य सरकारें चार सप्ताह के भीतर सरकारी आदेश (G.O.) जारी कर अनाथ बच्चों को RTE के तहत शामिल करें। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकारें ऐसे बच्चों की संख्या का सर्वेक्षण कर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी अनाथ बच्चा स्कूल से बाहर न रहे।


>यह फैसला लागू होने पर अनाथ बच्चों को भी उन्हीं सरकारी और निजी प्रतिष्ठित स्कूलों में प्रवेश का अधिकार मिलेगा, जैसा कि RTE अधिनियम की मूल भावना है। समान अवसर और गरिमापूर्ण शिक्षा अब सिर्फ विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर अनाथ बच्चे का संवैधानिक हक होगा।


>पौलोमी शुक्ला, जिन्होंने “विकेस्ट ऑन अर्थ – ऑर्फ़ेंस ऑफ़ इंडिया” नामक पुस्तक लिखी है, ने बताया कि यह फैसला “करुणा और संवैधानिक कर्तव्य का मिलन” है। यूनिसेफ के अनुसार, भारत में करीब 2 करोड़ अनाथ बच्चे हैं, लेकिन आज तक उनकी कोई आधिकारिक गिनती नहीं हुई। उन्होंने जनगणना में अनाथ बच्चों की गिनती अनिवार्य करने की भी मांग की, जिसे भारत सरकार के महान्यायवादी ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है।


>उनके उल्लेखनीय शोध और जनहित प्रयासों के लिए उन्हें फोर्ब्स “30 अंडर 30” की सूची में शामिल किया गया है। उनकी याचिका के बाद कई राज्य सरकारों ने अनाथ बच्चों के लिए आरक्षण और विशेष योजनाएं लागू की हैं।


>यह निर्णय न सिर्फ भारत के न्यायिक इतिहास का संवेदनशील और दूरदर्शी उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सबसे अनसुनी और कमजोर आवाज़ को भी भारत की न्यायपालिका में पूरा स्थान और सम्मान प्राप्त है।


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