>उत्तर प्रदेश में जातिवाद को समाप्त करने की दिशा में योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के 19 सितंबर के फैसले के बाद प्रदेश सरकार ने जाति आधारित सम्मेलनों, रैलियों और सार्वजनिक आयोजनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। अब FIR, पुलिस रिकॉर्ड, वाहनों और सार्वजनिक स्थलों पर जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा।
>इस फैसले का असर जाति आधारित संगठनों में साफ नजर आया। कई संगठन इसे सामाजिक संतुलन के खिलाफ बता रहे हैं, जबकि कुछ सुप्रीम कोर्ट में अपील की तैयारी कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि जातिगत भेदभाव संविधान के खिलाफ है और यह समाज में विभाजन फैलाता है। आधुनिक तकनीक और पहचान के अन्य साधन उपलब्ध हैं।
>सरकार ने 10-सूत्री आदेश जारी करते हुए जाति आधारित रैलियों पर रोक, सोशल मीडिया पर जातिगत कंटेंट पर कार्रवाई, वाहनों पर जातीय स्टिकर पर जुर्माना और थानों के नोटिस बोर्ड से जातीय नारे हटाने की बात कही है। हालांकि SC/ST एक्ट के तहत आरक्षण से जुड़े मामलों में छूट रहेगी।
>जाति संगठनों में नाराजगी की स्थिति है। करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष संदीप सिंह ने इसे समाज की आवाज दबाने वाला कदम बताया। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र त्रिपाठी ने कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए कहा कि जाति के आधार पर आरक्षण पर भी विचार होना चाहिए। परशुराम सेना के प्रदेश अध्यक्ष पंडित विनय त्रिपाठी सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की बात कर रहे हैं।
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