>सड़कें जीवन की धड़कन हैं, लेकिन जब लापरवाही इन पर हावी हो जाए, तो यही रास्ते मौत की दहलीज बन जाते हैं। बाराबंकी के नेवला चौराहा पर घटित एक हृदयविदारक हादसा इस सच्चाई की भयावह तस्वीर पेश करता है। 28 वर्षीय मोहम्मद आसिफ, जो अपनी बीमार मां की देखभाल कर जहांगीराबाद से लौट रहा था, एक तेज रफ्तार रोडवेज बस की टक्कर का शिकार हो गया और मौके पर ही उसकी दर्दनाक मौत हो गई।
>यह हादसा न केवल एक बेटे के कर्तव्य की अंतिम यात्रा बन गया, बल्कि एक नवविवाहित पत्नी का सुहाग भी उजाड़ गया। बीते 20 अप्रैल को मोहम्मद आसिफ की शादी हुई थी। शादी की मेंहदी अभी हाथों से उतरी भी नहीं थी कि विधवा का जीवन सामने आ खड़ा हुआ। यह दुर्घटना न सिर्फ एक परिवार का निजी संकट है, बल्कि यह एक सामाजिक प्रश्न भी खड़ा करती है—क्या हम सड़क सुरक्षा को लेकर इतने लापरवाह हो गए हैं कि रोजाना किसी का घर उजड़ जाना हमें सामान्य लगने लगा है?
>पुलिस ने बस को कब्जे में ले लिया है, चालक-परिचालक फरार हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक हम केवल “बस को जब्त” और “जांच जारी है” जैसे औपचारिक बयानों से संतोष करते रहेंगे? क्या दुर्घटना के बाद ही हमारी व्यवस्थाएं जागती हैं?
>एक और कटु सत्य इस हादसे में सामने आया—मृतक ने हेलमेट नहीं पहना था। चश्मदीदों के अनुसार, अगर उसने हेलमेट पहना होता, तो शायद उसकी जान बच सकती थी। यह बात एक बार फिर दर्शाती है कि हेलमेट या सीट बेल्ट जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन रक्षक साधन हैं।
>इस दर्दनाक घटना ने हमें फिर याद दिलाया है कि सड़कें केवल यातायात का माध्यम नहीं हैं, वे जीवन की सुरक्षा की भी मांग करती हैं। जरूरत है कि हम सब मिलकर सड़क सुरक्षा नियमों का न केवल पालन करें, बल्कि उनके प्रति जागरूकता भी फैलाएं।
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